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होलाष्टक-क्यों माने जाते हैं ये आठ दिन विशेष
हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से होलाष्टक का आरंभ होता है। यह काल होली पर्व से ठीक आठ दिन पूर्व शुरू होकर पूर्णिमा तक रहता है। इन आठ दिनों को धार्मिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और विशेष माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस समय वातावरण में ग्रहों की उग्रता बढ़ जाती है, इसलिए शुभ कार्यों से बचने की परंपरा चली आ रही है।
होलाष्टक शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—‘होली’ और ‘अष्टक’। अर्थात होली से पहले के आठ दिन। इन दिनों में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, सगाई, नामकरण जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। यह समय आत्मचिंतन, संयम और साधना के लिए उपयुक्त माना जाता है।
होलाष्टक का पौराणिक महत्व
होलाष्टक का संबंध प्रह्लाद और होलिका की कथा से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि होली से आठ दिन पहले ही भक्त प्रह्लाद को अनेक प्रकार की यातनाएँ दी गई थीं। हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को ईश्वर भक्ति से हटाने के लिए कठोर प्रयास किए। इन्हीं कष्टदायक दिनों की स्मृति में होलाष्टक को अशुभ माना गया है।
इन दिनों में प्रह्लाद की अटूट भक्ति, धैर्य और विश्वास की परीक्षा हुई थी। अंततः सत्य और भक्ति की विजय हुई और अधर्म का नाश हुआ। इस कारण यह काल केवल अशुभ नहीं, बल्कि धर्म, आस्था और आत्मबल को मजबूत करने का प्रतीक भी है।
होलाष्टक में ग्रहों का प्रभाव
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार होलाष्टक के आठ दिनों में सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और राहु क्रमशः उग्र अवस्था में माने जाते हैं। इन ग्रहों के अशांत प्रभाव के कारण नए कार्यों की शुरुआत को टालने की सलाह दी जाती है। ऐसा माना जाता है कि इन दिनों शुरू किए गए कार्यों में बाधाएँ और मानसिक तनाव बढ़ सकता है।
हालाँकि, दैनिक जीवन से जुड़े आवश्यक कार्य किए जा सकते हैं। केवल बड़े और मांगलिक निर्णयों को होली के बाद लेना शुभ माना जाता है।
होलाष्टक में क्या करें और क्या न करें
क्या करें:
- ईश्वर भक्ति, जप, ध्यान और पाठ करें
- विष्णु, नरसिंह या हनुमान जी की उपासना करें
- संयमित आहार लें और सात्त्विक जीवनशैली अपनाएँ
- नकारात्मक विचारों से दूर रहकर आत्मशुद्धि करें
क्या न करें:
- विवाह, सगाई या गृह प्रवेश जैसे कार्य
- नए व्यापार या बड़े निवेश की शुरुआत
- क्रोध, अहंकार और विवाद से बचें
होलाष्टक का आध्यात्मिक संदेश
होलाष्टक हमें यह सिखाता है कि जीवन में कठिन समय अस्थायी होता है। जैसे प्रह्लाद ने विपरीत परिस्थितियों में भी ईश्वर पर विश्वास बनाए रखा, वैसे ही हमें भी धैर्य और सकारात्मकता नहीं छोड़नी चाहिए। यह काल आत्ममंथन और मानसिक शुद्धि का अवसर देता है।

